Sunday, January 20, 2019

पुरानी कहानी

बिछड़ने से ज़रा पहले बिछड़ने की ना कोई बात थी
बस एक सूनी रसोई और कमज़ोर सी एक आस थी,

अरमानों से छपे कुछ कार्ड थे एक बड़ा मौका था
और बेज़ुबान सी सबकी एक हार थी,

ख़ुद को धोखा देता बचपन था
और ढाढस बांधती तेरी ज़िम्मेदारी थी,

कई नातों का इम्तेहान था
एक तरफ़ तेरा तो एक तरफ़ मेरा भगवान था,

झूठ और सच का अंतर बेमायने था
सुन्न पड़ा एक दिमाग और जलता बुझता चिराज था,

डुबडुबाति आँखों में चमकती एक आस थी
हैरां था, खोके भी तुझको मेरी ही तलाश थी,

बड़ा तो था मेरा दर्द, लेकिन 
तेरे मन के आगे हर चीज़ नादान थी

इस दुनिया से वो पहला साक्षात्कार था
चुप रहना क्या होता है यह जान वक़्त भी हैरान था

सबकी अपनी अपनी मजबूरी थी
हर शक़्स अपनी ज़मीन बचाने को तैयार था

मैंने भी कुछ खोया तो कुछ पाया था
बोला तो बहुत लेकिन हिसाब शायद ही कभी लगाया था,

पांच साल बीते आज मन में फ़िर वही सुगबुगाहट है
तेरे ख़त शायद पोहचेगे, राहों में कुछ ऐसी ही आहत है

बिछड़ने से ज़रा पहले बिछड़ने की ना कोई बात थी
बस एक सूनी रसोई और कमज़ोर सी एक आस थी।


Friday, January 18, 2019

कोना

घर का वो कोना ही ठीक है,
इस दुनिया में न दिल मिलता है ना दिमाग

मेज़ पे चढ़ी गर्द पे कोई सवाल नहीं पूछता
इस दुनिया के सवाल हैं की जिनपे गर्द ही नहीं पड़ती

कप तले कितने ही छळले बने होंगे
इस दुनिया के चक्कर हैं की ख़त्म ही नहीं होते

पेन होल्डर में सही पेन ना मिलना भी उलझन नहीं देता
इस दुनिया में पेन तो मिलते हैं लेकिन ख़याल नहीं मिलता

वो दराज़ किसी भानुमति के पिटारे से कम नहीं
इस दुनिया में पिटारे तो बहुत हैं लेकिन कोई राज़ नहीं

ना जाने क्या क्या समाया रहता है कागज़ों के गट्ठर में
इस दुनिया के कागज़ों को हाथ लगाने का मन नहीं करता

घर का वो कोना ही ठीक है,
इस दुनिया में न दिल मिलता है ना दिमाग


Wednesday, January 16, 2019

पड़ाव

एक पड़ाव था जो यूँ ही निकल गया 
एक ख़याल था जो यूँ ही पिघल गया 

कोशिश बहुत की पकड़ने की
 एक धुएं सा ग़ुबार था जो पल में घुल गया

केहना था कुछ, कुछ और कह गया
मन में एक विचार था जो मन में रह गया

कभी सर पकड़ता तो कभी पूँछ
मानो हथेली में एक अंगार था जो फुर्र से उड़ गया

मेरा तो वक़्त पे भी उधार था
इसलिए, फिर से वक़्त मिल गया 

कागज़ों पे कुछ उभार था
जो यूँ ही दिख गया

इन उभारों में एक "काश" था
जो फिर से गुम गया

"पता" सोचा कलम से पूछ लूं 
"जाने दो" बोलके मन फिर चुप हो गया

फ़िर एक पड़ाव था जो यूँ ही निकल गया 
एक ख़याल था जो यूँ ही पिघल गया