Sunday, January 21, 2018

सर्द दोपहर

सर्द दोपेहेरें भी अजीब हैं
लगता है इनमे समय भी रुक जाता है

ना कोई तू-तू ना कोई मैं-मैं
बस घंटियों की खनक में हर एक 'कल' सामने आजाता है

ये वक़्त का दोष है या मेरी सोच का, पता नहीं
लेकिन इन दोपेहेरों में मन बिलकुल शांत हों जाता है

कहीं दूर होती खट-खट भी पास सुनाई पड़ती है
बचपन की हर हरकत आज दिखाई पड़ती है

सब चुप बैठे होते हैं अपनी कुर्सियों पे
लेकिन हर कोई एक-दूजे से बात करने लगता है

बीच में रखे चाय के कप, मुह पे धूप बिखेरते हैं
मानो बता रहे हों अब किसके बोलने की बारी है

लेकिन ये तमाशा बालकनी में धूप रहने तक ही चलता है
सूरज ढलते ही वक़्त फिर से अपनी मन मानी करने लगता है

चाय के कप फिर से खाली हों जाते हैं, और हर इंसान
फ़िर से अपनी जुबां का उपयोग करने लगता है

फ़िर से हर कोई उलझनों में फास जाता है
फ़िर से हर कोई अपनी ही परछायी तलाशता है


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