Wednesday, January 24, 2018

ढूँढता हूँ

कोई मौका तो कोई कंधा ढूँढता है
अपनी सिलवटें छुपा सकूं, मैं ऐसा भेस ढूँढता हूँ

किससे तो बहुत हैं मेरे पास भी
बस अपने दर्द को ठहाके लगाके बेचता हूँ

क्या फ़र्क पड़ता है तेरे सुनने से
इस बेरुख़ी की इन्तेहः को देखता हूँ

कुछ दर्द हैं, इसीलिये उम्मीद भी है
बस इसी उम्मीद का भोझ लिए घूमता हूँ

बात तो हुई है कई दफ़ा
लेकिन हर बार शीशे टूटते ही देखता हूँ

'काश' की दुनिया 'कल' दिखाती है
बस इसी कल में ख़ुद को ढूँढता हूँ

शिक़ायत इन हवाओं से होती तो बोलता नहीं
बहुत से तिनके बिखरें हैं जिनको अकेले ही बटोरता हूँ

कोई मौका तो कोई कंधा ढूँढता है
अपनी सिलवटें छुपा सकूं, मैं ऐसा भेस ढूँढता हूँ

Image Courtesy : Mika Suutari

Sunday, January 21, 2018

सर्द दोपहर

सर्द दोपेहेरें भी अजीब हैं
लगता है इनमे समय भी रुक जाता है

ना कोई तू-तू ना कोई मैं-मैं
बस घंटियों की खनक में हर एक 'कल' सामने आजाता है

ये वक़्त का दोष है या मेरी सोच का, पता नहीं
लेकिन इन दोपेहेरों में मन बिलकुल शांत हों जाता है

कहीं दूर होती खट-खट भी पास सुनाई पड़ती है
बचपन की हर हरकत आज दिखाई पड़ती है

सब चुप बैठे होते हैं अपनी कुर्सियों पे
लेकिन हर कोई एक-दूजे से बात करने लगता है

बीच में रखे चाय के कप, मुह पे धूप बिखेरते हैं
मानो बता रहे हों अब किसके बोलने की बारी है

लेकिन ये तमाशा बालकनी में धूप रहने तक ही चलता है
सूरज ढलते ही वक़्त फिर से अपनी मन मानी करने लगता है

चाय के कप फिर से खाली हों जाते हैं, और हर इंसान
फ़िर से अपनी जुबां का उपयोग करने लगता है

फ़िर से हर कोई उलझनों में फास जाता है
फ़िर से हर कोई अपनी ही परछायी तलाशता है


ख़ुद की कहानी

वक़्त की धुप में झुलसे हुए से कुछ एहसास हैं
कुछ तेरे तो कुछ मेरे पास हैं

मैं तो छुपा के रखता हूँ इनको जेबों में
कभी न ओझल हों बस यही विश्वास है

कही अनकही के बीच बहुत कुछ गुम हो जाता है
दो पलों के बीच ही तो सारा वक़त समाता है

कभी ख़ुद से मिलना फ़ुर्सत में
एक वही तो शक्स है जो सबसे ज़्यादा धोका खता है

बाकी तो बस शिक़ायत करते हैं
कभी आगे तो कभी पीछे चलते हैं

फ़र्क तो मुझे बस 'ख़ुद' से पड़ता है
हमेशा साथ चलता फिर भी चुप रहता है

नाजाने तेरे साथ कौन चलता है
नाजाने तू किससे शिक़ायत करता है

धुप तो तूने भी देखी है और मैंने भी
मैं तो 'ख़ुद' को कोस लेता हूँ, तू नाजाने किससे बात करता है

वक़्त की धुप में झुलसे हुए से कुछ एहसास हैं
कुछ तेरे तो कुछ मेरे पास हैं

मैं तो छुपा के रखता हूँ इनको जेबों में
कभी न ओझल हों बस यही विश्वास है