Thursday, February 25, 2016

मन

ये मन भी कितना अजीब है
रोता है परेशान रहता है
कई शिकायतें करता है
पर पूछो तो मुह फेर लेता है

जाने क्या चाहता है
जाने किसे अपना मानता है
शायद इसने बोहत कुछ देखा है
शायद इसने खुद को ही रोका है

अपनों को ढूंढ़ता, रिश्तों को तोलता है
अतीत को याद कर, छुप छुप के रोता है
कुछ बातें, जो अधूरी रह गयीं
उनको पूरी करने की जद्दोजहद करता है

इसे भी तो कल और कल को समझना होगा
सैयम्म रखके आगे बढ़ना होगा
समय रिश्ते कहा खत्म कर पाता है
हर एक रिश्ते को समान समझना होगा

कुछ अंतर्विरोध सा लगता है
आधा मन इधर तो आधा उधर बटा सा दिखता है
लगता है, और ज़िम्मेदारी लेनी होगी
यादों को संजो भविष्य की तैयारी करनी होगी

लेकिन ये सब कितना व्यावहारिक सा दिखता है
अपने घर के परे एक पराया ठिकाना सा लगता है
मन नहीं करता आँख मूंदने को
लेकिन शायद "वो अपना" केवल सपनो में ही दिखता हो

फिलहाल मन और आँखें ही हाथ थामें हैं
एक दूसरे का परिआय बन
कुछ पुराने बोल गुनगुनाते हैं
कभी मन भारी, तो कभी आँख नम होती है
बस इसी तरह दोनों के एकांत की पूर्ति होती है


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