Friday, September 18, 2015

दो साल

जब से कलम से सियाही का नाता छूटा 
तुझसे मिलने का हर एक सपना छूटा 

साल दर साल बस बहाने तलाशे 
हर एक बहाने का फ़साना झूठा
 
तीज निकली त्योहार निकले 
और निकले ये दो साल 

इन् सालों के पल निकले 
हर पल ऐसे निकले जैसे हों दो साल 

बहुत देखा बहुत सहा 
बहुत सुना बहुत कहा 

लगा तेरी ज़रुरत बस मुझको है
मेरी नम आँखों से फरक बस तुझको है 

इस दुनिया को क्या मतलब मुझसे 
इस दुनिया को क्या मतलब तुझसे 

कब मिलेगी कहाँ मिलेगी 
बस यही कहते बीते ये दो साल