Tuesday, August 5, 2014

साक्षी

अन्गिनत किस्से सुने
पढ़ी व्याखाएं सौ

हमेशा इसने विस्मित किया
जला के एक नयी लौ

ज़रूरी नहीं इसकी बोली सुनी जाए
ये तो शांत नदी है जो चुप चाप बहती जाये

'मैं' को कहाँ जानता है यह
'हम' से ही रिश्ता निभाता है यह

दो आत्माओं को जोड़
एक सांस बनाता है यह

देखा है इसको अपनों में
बेफ़िक्री के अनेकों किस्सों में

देखा है इसको इनकी आँखों में
ना होते हुए भी सहमत, इनकी बातों में

इनके साथ में, इनकी बात में
और देखा इनकी बीती हर एक रात में

साथ थे साथ हैं साथ रहेंगे
शायद ही कभी दूरी कि शिकायत करेंगे

मान कमाया प्यार कमाया
ख़ुद को भूल, अपनों पे ख़ुद को मिटाया

अधूरी आशाओं का क्या
जो पाया उसमे ही संतोष जताया

मैं तो मात्र साक्षी था इनकी शक्ति का
समय का भी निराला खेल था परिस्थिथि का

मन है फिर साक्षी बनने का
इनके जीवन को दोबारा देखने का

मालूम है ऐसा हो ना पायेगा, यह सिर्फ़ इच्छा ही तो है
ना भी पूरी हुई तो सोचने में क्या जायेगा


Sunday, August 3, 2014

तस्वीरें

तू क्या जाने इन नम आँखों कि बात
अब तो बस होती है छुपछुपके बरसात

कई तस्वीरें याद आती हैं
यादों पे तैरते इन आँखों के किनारे लग जाती हैं

मैं उठता हूँ, एक एक तस्वीर बीनता हूँ
तू कब आयेगी ये सोचता हूँ

अब तो बहुत दिन बीते, अब तो आजा
पुरानी देखलीं बहुत, एक नयी तस्वीर दिखाजा

देख तो मेरा हाल कैसा है
कोरे कागज़ पे रखी खाली कलम सा है

ना कल का पता ना आज का
साथ है तो बस तेरी याद का

आंसुओं में अगर रंग होते, तो एक तस्वीर बनाता
अधूरे सपनों कि झलक तुझको भी दिखाता

वो दुनिया और है जहाँ तू है
मेरी हर पंक्ती में बस अब तू है

आजा ये घर फिर से बनायेंगे
आजा 'हम सबके' रंगों कि एक नयी तस्वीर बनायेंगे