Tuesday, March 25, 2014

वापसी

 अजीब है इस बार की वापसी 
ना जल्दी है ना इंतज़ार करती आँखें

अजीब है इस बार की वापसी
ना मंज़िल है ना जानी पहचानी राहें

बहुत कुछ बदला इन सर्दियों ने
नहीं बदलीं तो वोह झूझती आँखें

एक सांस छूटी तो एक मिली
देखते ही देखते जुड़ गईं हज़ारों यादें

जीने का मकसद बेमानी सा लगता है
हर शख्स अपने ही घर में अंजाना सा दिखता है

बात करने के बहाने तलाशने पड़ते हैं
सब कुछ भूल जाने के तरीके बनाने पड़ते हैं

पुरानी तस्वीरें तो आज भी बोलतीं हैं
तस्वीरों से आँख मिलाने में डर लगता है

सिर्फ़ समय ही तो बदला है
फिर क्यों अजीब है इस बार की वापसी


Sunday, March 16, 2014

होली

यादों के हैं ये अबीर गुलाल 
तेरे वो गीले-सूखे घुंघराले बाल 

प्यार कि गुजियों की वो टोकरी 
लो आगई सताने फिर से होली 

क्या डालनी होगी तड़के आखत 
तूने ही भेजी है ना यादों कि आहट 

रंगों में रंग भी तो भेजतीं
खुद भी आने कि बात तो करतीं

नहीं है रंगोली इस बार आँगन में
नहीं है तेज़ी इस बार फाल्गुन में

बस एक सन्नाटा सा पसरा है
तेरे अंश को देख, तुझको छूने का मन करता है

कब से बचाये थे टेसू के फूल, भर के झोली
लो आगई सताने फिर से होली

Image Courtesy : Shadow Chief

Saturday, March 15, 2014

इच्छा

सपनों में कब आओगी माँ 
कब फिर से बुलाओगी माँ 

बहुत दिन बीते आवाज़ सुने
कब फिर से सर सहलाओगी माँ 

हर बात को तुम्हारी याद करता हूँ 
हर चीज़ में तुमको ढूंढ़ता हूँ 

समय तो चलेगा, बदलेगा
कब फिर से मिलने आओगी माँ

जैसे कल कि ही तो बात थी 
तुम मेरे साथ थीं 

कितना समझातीं थीं फ़ोन पे 
अब कब समझाओगी माँ 

अरे कुछ तो बोलो 
चलो अब ये नाराज़गी छोड़ो 

बहुत मन है मिलने का 
और कितना सताओगी माँ 

अकेली तो तुम भी हो, मानता हूँ
और यहीं कहीं हो, जानता हूँ

बस एक बार आवाज़ देदो 
और कितना तरसाओगी माँ


Thursday, March 13, 2014

मेरी कहानी

तुमने सिर्फ़ परछाइयाँ देखीं, ना देखा मेरा मन 
ये सब तो कथाएं थीं, जो मैंने देखीं होकर सत्तब्ध 

समय कि सिहाई कभी ख़त्म नहीं हुई 
तो विचारों कि दवात पर कभी नज़र नहीं गई 

पन्ने बहुत थे उस डायरी में 
वो कलम थी जो बस बे-सुध चलती रही 

ये मेरा मेरे से ही संवाद था 
हर आभास अपने आप में ही अपवाद था

जो दिखा वो लिखा, एक एक शब्द का
सूत समेत हिसाब दिया

अब सोचता हूँ कि डायरी बदल लूं
लेकिन अच्छे समय का आश्वासन किस्से लूं

क्योंकि जो कुछ मेरा है वो सब मैंने देखा है
तुमने तो बस पड़ा और सहजता से भुला दिया है




Sunday, March 9, 2014

लम्हे

अतीत का लेखा जोखा हैं वो लम्हे 
यादों का झोंका हैं वो लम्हे 

नम आँखों की वजह हैं वो लम्हे 
गहरी साँसों कि तरह हैं वो लम्हे 

कभी मुस्काते तो कभी कचोटते वो लम्हे 
काले सफ़ेद में रंग उभारते वो लम्हे 

उन लोगों के एहसानों के हैं वो लम्हे 
हाथ से सरकती रेत के हैं वो लम्हे 

सपनों का मेल हैं वो लम्हे 
समय का निर्दयी खेल हैं वो लम्हे

जाने किस घर के हैं वो लम्हे 
जाने किस दुनिया के हैं वो लम्हे