Sunday, August 18, 2013

मेरी परछाईं

अकेले चलने कि एक चाहत सी थी
आधे अधूरे हिसाब रखने कि एक आदत सी थी

जो छूटता वो लिख लेता, जो मिलता वो भुला देता
बस ऐसे ही जीवन को समझने कि एक कोशिश की थी

कभी ख़याल कम पड़े, तो कभी शब्द
और कभी इच्छा तो कभी वक़्त

वो बस यूँ रहा
कि एक आईने को देखते भागता रहा

शायद कभी परछाईं दिखे, ये सोचके
अंधेरे में ही जागता रहा

अनजान था अंधेरे के इस खेल से
डरता था रौशनी के उस मेल से

फिर एक सुबह, नर्म सी धूप पड़ी
पीछे एक परछाईं दिखी

डरी सी सहमी सी
अनजानी सी अपनी सी

वो कुछ कहती, मैं समझता कुछ और
झुंझला के भागा, तो वो भी चलदी उस ओर

वो बोली, मैं परछाईं हूँ तुम्हारी
सदा साथ रहूंगी जब तक साँसें हैं हमारी

शायद इसी ने वो दीप जलाया है
सदा साथ रहने का एक विश्वास दिलाया है

Image Courtesy : RussoClub


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