Tuesday, August 20, 2013

मेहमान

इधर रात ने अपनी पहली करवट ली
तो उधर एक अप्रत्याशित मेहमान ने दस्तक दी

मैं तो यूं ही खाली बैठा था
थोड़ा ध्यान दिया तो एक चिड़िया की चेह-चाहट सुनाई दी

सोचा शायद इसी को 'कलयुग' कहते हैं
रात में चिड़िया तो दिन में सपने दिखाई देते हैं

पहले तो हंसी आई इस सब पे
फिर लगा कहीं ये मेरी कहानी तो नहीं कहते हैं

जो भी हो मुझे क्या पता, वो चिड़िया
भटकी थी या आज़ाद थी

शायद वो जानती थी मुझको, इसीलिए तो
उसकी, केवल एक ही बार आवाज़ सुनाई दी

वैसे बात तो विस्मित करती है
सोचता हूँ वो क्या सोचती है

खैर, रहने दो इस चिड़िया जैसी अनेक कहानियां हैं
जो मेरी याद की बालकनी में वक़्त-बे वक़्त दस्तक देती हैं

Image Courtesy : The Hindu

Sunday, August 18, 2013

दिल दिमाग

ये दिमाग कभी कभी गर्म तवे सा लगता है
एक रोटी सिकते ही, अगली डालो वरना तपके जलने लगता है

दिल से क्या नाता इसका, जहाँ दिल एक शांत व्यक्ती
तो वहीँ ये एक जिद्दी बच्चे सा लगता है

दिल विचारों के तार बुनता
तो ये सही गलत कि गिनती करता

दिल तस्सल्ली कि धूप तलाशता
तो ये बेतुकी इच्छाओं के भवरे के पीछे भागता

दोनों का नज़रिया बिलकुल अलग है
एक को विचार तो दूसरे को तर्क कि गरज है

बस इसी मंथन से कुछ मोती
मिलते तो कुछ खो जाते

Image Courtesy : Da Perple Carrot

मेरी परछाईं

अकेले चलने कि एक चाहत सी थी
आधे अधूरे हिसाब रखने कि एक आदत सी थी

जो छूटता वो लिख लेता, जो मिलता वो भुला देता
बस ऐसे ही जीवन को समझने कि एक कोशिश की थी

कभी ख़याल कम पड़े, तो कभी शब्द
और कभी इच्छा तो कभी वक़्त

वो बस यूँ रहा
कि एक आईने को देखते भागता रहा

शायद कभी परछाईं दिखे, ये सोचके
अंधेरे में ही जागता रहा

अनजान था अंधेरे के इस खेल से
डरता था रौशनी के उस मेल से

फिर एक सुबह, नर्म सी धूप पड़ी
पीछे एक परछाईं दिखी

डरी सी सहमी सी
अनजानी सी अपनी सी

वो कुछ कहती, मैं समझता कुछ और
झुंझला के भागा, तो वो भी चलदी उस ओर

वो बोली, मैं परछाईं हूँ तुम्हारी
सदा साथ रहूंगी जब तक साँसें हैं हमारी

शायद इसी ने वो दीप जलाया है
सदा साथ रहने का एक विश्वास दिलाया है

Image Courtesy : RussoClub