Saturday, February 16, 2013

नियति

कभी कभी इन शब्दों का भी हिसाब कर लेता हूँ
कभी कभी नियति पे भी व्यंग कस लेता हूँ

सोचता हूँ क्या ये मुझपे ही इतनी मेहेरबां है
या अन्य भी इससे इतने ही हैरां हैं

हर पल दूजे से अनजाना सा लगता है
मेरा वो अपना भी अचानक बेगाना सा लगता है

सपने खोने लगते हैं ऐसे
सुखी पत्तों को हवा ले जाती हो जैसे

लेकिन शब्दों से भी कहाँ मन भरता है
समय तो अपनी ही कहानी रचता है 

कितना भी झूझ लो क्या फर्क पड़ता है
आखिर वही होता है जो नियति ने सोचा होता है

Image Courtesy : http://bit.ly/YegwYE 



Tuesday, February 12, 2013

कैसे


कैसे चीज़ों को नयी परिभाषा दूं
कैसे इस मन को नयी अभिलाषा दूं

कैसे कल की ना सोचूँ
कैसे नियति को होने से रोकूं

कैसे तेरे वो एहसान भुला दूं
कैसे मेरे वो नाम भुला दूं

कैसे तुझको अलग कर दूं
कैसे अपना ही जीवन व्यर्थ कर दूं

कैसे इन सबके जवाब ढूँढू कैसे.......