Wednesday, September 25, 2013

नन्ही परी

मेरे घर आई एक नन्ही परी
ढेरों खुशियाँ लाई ये नन्ही परी

आने से इसके, कई नयी हलचल देखीं
झूझते इंसानों की आखों में नयी उम्मीदें देखीं

माँ की, न रूकती मुस्कान देखी
ख़ुशी का इज़हार करती बाबा कि अटकती ज़बान देखी

अपना हक़ गिनवाते एक शरारती बेहेन देखी
रिश्ते नातों कि गहराइयाँ भी देखी

और फिर देखा अपनी परछाई को
नयी ज़िम्मेदारी लेते, बदलते एक नारी को 

अब ज़िम्मेदारी के मायने फिर बदले हैं
अब ये दायरे और भी बड़े हैं

बस अब इस ख़ुशी को हमेशा संजोना है
जो भी करना है बस इसी के लिए करना है

क्योंकि, मेरे घर आई एक नन्ही परी
ढेरों खुशियाँ लाई ये नन्ही परी



Tuesday, August 20, 2013

मेहमान

इधर रात ने अपनी पहली करवट ली
तो उधर एक अप्रत्याशित मेहमान ने दस्तक दी

मैं तो यूं ही खाली बैठा था
थोड़ा ध्यान दिया तो एक चिड़िया की चेह-चाहट सुनाई दी

सोचा शायद इसी को 'कलयुग' कहते हैं
रात में चिड़िया तो दिन में सपने दिखाई देते हैं

पहले तो हंसी आई इस सब पे
फिर लगा कहीं ये मेरी कहानी तो नहीं कहते हैं

जो भी हो मुझे क्या पता, वो चिड़िया
भटकी थी या आज़ाद थी

शायद वो जानती थी मुझको, इसीलिए तो
उसकी, केवल एक ही बार आवाज़ सुनाई दी

वैसे बात तो विस्मित करती है
सोचता हूँ वो क्या सोचती है

खैर, रहने दो इस चिड़िया जैसी अनेक कहानियां हैं
जो मेरी याद की बालकनी में वक़्त-बे वक़्त दस्तक देती हैं

Image Courtesy : The Hindu

Sunday, August 18, 2013

दिल दिमाग

ये दिमाग कभी कभी गर्म तवे सा लगता है
एक रोटी सिकते ही, अगली डालो वरना तपके जलने लगता है

दिल से क्या नाता इसका, जहाँ दिल एक शांत व्यक्ती
तो वहीँ ये एक जिद्दी बच्चे सा लगता है

दिल विचारों के तार बुनता
तो ये सही गलत कि गिनती करता

दिल तस्सल्ली कि धूप तलाशता
तो ये बेतुकी इच्छाओं के भवरे के पीछे भागता

दोनों का नज़रिया बिलकुल अलग है
एक को विचार तो दूसरे को तर्क कि गरज है

बस इसी मंथन से कुछ मोती
मिलते तो कुछ खो जाते

Image Courtesy : Da Perple Carrot

मेरी परछाईं

अकेले चलने कि एक चाहत सी थी
आधे अधूरे हिसाब रखने कि एक आदत सी थी

जो छूटता वो लिख लेता, जो मिलता वो भुला देता
बस ऐसे ही जीवन को समझने कि एक कोशिश की थी

कभी ख़याल कम पड़े, तो कभी शब्द
और कभी इच्छा तो कभी वक़्त

वो बस यूँ रहा
कि एक आईने को देखते भागता रहा

शायद कभी परछाईं दिखे, ये सोचके
अंधेरे में ही जागता रहा

अनजान था अंधेरे के इस खेल से
डरता था रौशनी के उस मेल से

फिर एक सुबह, नर्म सी धूप पड़ी
पीछे एक परछाईं दिखी

डरी सी सहमी सी
अनजानी सी अपनी सी

वो कुछ कहती, मैं समझता कुछ और
झुंझला के भागा, तो वो भी चलदी उस ओर

वो बोली, मैं परछाईं हूँ तुम्हारी
सदा साथ रहूंगी जब तक साँसें हैं हमारी

शायद इसी ने वो दीप जलाया है
सदा साथ रहने का एक विश्वास दिलाया है

Image Courtesy : RussoClub


Saturday, February 16, 2013

नियति

कभी कभी इन शब्दों का भी हिसाब कर लेता हूँ
कभी कभी नियति पे भी व्यंग कस लेता हूँ

सोचता हूँ क्या ये मुझपे ही इतनी मेहेरबां है
या अन्य भी इससे इतने ही हैरां हैं

हर पल दूजे से अनजाना सा लगता है
मेरा वो अपना भी अचानक बेगाना सा लगता है

सपने खोने लगते हैं ऐसे
सुखी पत्तों को हवा ले जाती हो जैसे

लेकिन शब्दों से भी कहाँ मन भरता है
समय तो अपनी ही कहानी रचता है 

कितना भी झूझ लो क्या फर्क पड़ता है
आखिर वही होता है जो नियति ने सोचा होता है

Image Courtesy : http://bit.ly/YegwYE 



Tuesday, February 12, 2013

कैसे


कैसे चीज़ों को नयी परिभाषा दूं
कैसे इस मन को नयी अभिलाषा दूं

कैसे कल की ना सोचूँ
कैसे नियति को होने से रोकूं

कैसे तेरे वो एहसान भुला दूं
कैसे मेरे वो नाम भुला दूं

कैसे तुझको अलग कर दूं
कैसे अपना ही जीवन व्यर्थ कर दूं

कैसे इन सबके जवाब ढूँढू कैसे.......