Wednesday, May 23, 2012

गीली मिटटी

आज एक कुम्हार जैसा महसूस कर रहा था
गीली मिटटी जैसे कई विचार थे जिनको तक रहा था

सब कुछ आँखों के सामने ही पड़ा था
फिर भी क्या बनाऊं क्या बनाऊं सोच रहा था

शायद मिटटी रख के चक्का चलने कि देर थी
जो आकृति थी वो तो पहले ही मन में ढल चुकी थी

ना जाने कहाँ कहाँ से ये मिटटी आई है
भावनाओं और विचारों का एक बवंडर लायी है 

कई जाने पहचाने से चेहरे हैं इसमें
भूत, भविष्य और वर्तमान के कई रंग भी है इसमें

इच्छाओं के पानी से गीली है ये मिटटी
एकदम सच्ची है उस कोरे कागज़ सी ये मिटटी

और ये चक्का भी तो उस समय सा लगता है
जब भी चलता है कोई नयी आकृति ही रचता है

आकृति चाही अनचाही सी, कभी उस छोटे
कुल्लड तो कभी उस पतली सुराही सी

ये मिटटी तो अक्षत है इसे कैसे भी ढाल लो
ये मन भी तो निश्छल है कुछ इसकी भी मान लो 

जो जैसा ढलता है ढलने दो, बस इन
विचारों को आज़ादी के आकाश में उड़ने दो

Image Courtesy : Clay Ave Pottery Studio
(
http://transformingclay.wordpress.com/page/25/ )

2 comments:

vinny said...

Beautiful!!

1CupChai said...

thanks a lot vinaya :)

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