Saturday, May 19, 2012

अधूरे हम

तुमसे कुछ बात करने का मन था
एक अधूरी सी मुलाकात करने का मन था

कुछ लिखा था जो तुम्हें सुनाना था
मेरा एक सपना था जो तुम्हें दिखाना था

थोड़ा झिझक रहा था कहने में
थोड़ा डर भी था मेरे में

वो हिम्मत कहाँ से लाता
जो कुछ पाया वो सब कैसे लुटाता

सब कुछ एक नाज़ुक सी डोर से बंधा था
क्या मेरा था क्या पराया ये भी कहाँ पता था

मन किया सब कुछ छोड़ दूं 
इस डोर को अपने ही हाथों तोड़ दूं

फिर एक ख़याल आया, शायद
अपने ही शब्दों पे मुझको तरस आया

सोचा कितना कमज़ोर हो गया हूँ
उतना ही जितना अधूरा रह गया हूँ

काश ये सपने पूरे हो पाते
काश ये अधूरे शब्द कहीं खो जाते

Image Courtesy : Luke Stephenson
(http://goo.gl/eyb8F)

8 comments:

Empty_mind said...

Chaumukhi Prabita hai is Paras me...

1CupChai said...

arrey amit bhai, izzat afzaahi ka bohot bohot shukriya!! :))

Kinara :) said...

Beautiful :)
काश ये सपने पूरे हो पाते
काश ये अधूरे शब्द कहीं खो जाते !
Everyone has this urge,I believe!:)

1CupChai said...

@Kinara : thanks :) very true each one of us long for this completeness.

Archana said...

Shabd toh poore hote hein...adhure se hum inko poora nahi padh paate..... :)

1CupChai said...

@Archana sahi kaha archana :)

Anonymous said...

No doubt, Writing a poem is an art, but redirecting your energy in a way to produce an excellent piece of product is commendable. The 2 lines ending has all the gist of each one lives... काश ये सपने पूरे हो पाते
काश ये अधूरे शब्द कहीं खो जाते

1CupChai said...

@Retvic - each one us have this shear urge to have something in our life. I just used that emotion :) bohot bohot shukriya padney ke liye :)

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