Saturday, April 21, 2012

इर्षा

मैं क्यों करूं घृणा
ये तो तेरा काम है
जो मन में है तेरे
उसका ही तो इर्षा नाम है

अग्नि को तुम कहाँ पूछते हो
बस खुद में जलती
इस अग्नि
में ही जलते हो

मैं का आलेख
थकाता नहीं तुम्हें
किसीकी सफलता का विचार 
भाता नहीं तुम्हें

खुद तो शीशे के घर
में रहते हो
और दूसरों के चीर हरण
की प्रतीक्षा करते हो

एक बुलबुला जो
फुलाया है तुमने
केवल हरा रंग है
समाया तुममे 

एक न एक दिन
ये घर ही टूटेगा
एक न एक दिन
ये बुलबुला भी फूटेगा

फिर पूछोगे
क्या पाया तुमने
मैं बोलूँगा 
वही जो कुछ उगाया तुमने

Image Courtesy : Laurel Havir ( http://www.storyculture.com/blog/lalla-porter---oil-paintings/ )



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