Sunday, April 15, 2012

रात की बात


शिकवा अगर जिंदगी से रेहता, तो 
तकिये के नीचे तेरा वो ख़याल न होता

आँखें तो मेरी ज़ुबा हैं, पर 
लाख पूछने पे भी कोई जवाब मिला कहाँ है

ये तो रात थी जो साथ निभाती गयी
बोझल आँखें भी तेरा ही मूँ ताकती रहीं

एक ख़ामोशी थी जो बोहत कुछ केह रही थी
लेकिन ये अखें भी तो वही सब सेह रहीं थीं

ग़म की चादर हटा के देखा तो कुछ खोया हुआ था
वो शायद एक सपना था जो मैं संजोये हुए था

कुछ मोती थे जो पलंग के पास बिखरे थे
ये वही थे जो तुने मुझको दिए थे

आले में जली लौ भी अब बुझ चली थी, लेकिन
तेरी याद की रौशनी कम होने का नाम नहीं ले रही थी

खिड़की से बाहर झाँका तो वो चाँद भी सब देख रहा था
शायद वो भी बेचैन था इससे, जो कुछ हो रहा था

आँगन में कोहरा भी छाया हुआ था
हर उस ठिठुरन में बस तेरा ही एहसास समाया हुआ था

तुझको पाने के लिए मुझको फिर से खोना होगा
शायद एक आखरी बार उस चादर में सोना होगा

आज अर्से बाद ये आँखें नम हुई हैं
शायद तूनें फिर छुआ है कहीं

मन तो बोहोत कुछ चहता है, पर शायद
मायनेय तो वहि रखता है जो ये जीवन पाता है

Botanical Garden Bhubaneshwar

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