Wednesday, March 28, 2012

break free


To be honest I started with some negative dark thoughts in my head, I don't know when this character of Shiva (from Shiva - Triology) crept in and transformed the whole thought process. Amazingly I realized this only when I wrote the last line. Knowingly or unknowingly this has to be a tribute to the character of "Shiva" which has always been wild and free.


He started empty handed
without any burden without any inhibition
with some crazy dreams and a faded destination 

He was as wild as free
he ran through the mountains he ran through the trees
he ran like a unicorn with all that glee

he loved the sun he loved the rain
he loved the breeze as if he'll never have pain
he thought of a world where there is nothing to explain


he dreamt like a child
his dreams were crazy and wild
a trail of thoughts that could never be complied


he never knew what is hate
he never thought about his fate
he was a hurricane which was never to abate 


he belonged to everyone yet he was not taken
he was a majestic fountain that none could beckon
he was a rebellious soul which stood like a mountain


today when I stand beside this old banyan tree
I dream of a day which is purely carefree
a soul which can break the shackles and scream "Yes I am free" 


Image Courtesy : Abhishek Singh ( http://abhiart.blogspot.in/  )

Saturday, March 24, 2012

चल चलें

this was inspired by following lines by Rumi.


"Pata hai
Yahan se bohot door
galat aur sahi ke paar
ek maidaan hai
main wahan miloonga tujhey"

चल चलें इस दरिया के पार
चल चलें सरहद के उस पार
चल चलें एक ऐसी दुनिया में
जहाँ सारी धरती तेरी और
सारा आकाश मेरा हो


चल चलें इस दरिया के पार
चल चलें होके अपनी सोच पे सवार
चल चलें एक ऐसी दुनिया में
जहाँ सिर्फ मन की चले और
जहाँ ज़बां वही बोले जो मन कहे


चल चलें इस दरिया के पार
चल चलें करने अपनी आज़ादी से प्यार 
चल चलें एक ऐसी दुनिया में
जहाँ ये बंदिशें ना हों 
अगर कोई हो तो सिर्फ तुम और मैं हूँ


चल चलें इस दरिया के पार
चल चलें देखने अपने सपनों को एक बार
चल चलें एक ऐसी दुनिया में
जहाँ रात का अर्थ दिन और
जहाँ नफरत का मतलब भी हो प्यार


चल चलें इस दरिया के पार
चल चलें मिलने उन् उम्मीदों से एक बार
चल चलें एक ऐसी दुनिया में 
जहाँ सूरज रौशनी दे तपिश नहीं 
जहाँ चाँद शीतल रहे विचलित नहीं


चल चलें इस दरिया के पार 
चल चलें देखने उन् परिंदों को एक बार
चल चलें एक ऐसी दुनिया में
जहाँ सांस और घुटन का नाता ना हो
जहाँ कभी कोई काला सियाह ख़याल आता ना हो 


चल चलें इस दरिया के पार
चल चलें सरहद के उस पार 



she

you are earth you are nature
you are life and its creator


you brought me you brought her
you took the pain whenever it mattered 


you watered me you nurtured her
you made us tree while you got withered


you are strong you are selfless
you never had a moment which was aimless


you gave us life you gave us wings
you gave us seasons and a reason to sing


you wiped our tears and you forgot yours
you gave us cozy lap while you chose the floor


the signs are enough I am completely awed
if there has to then you are my God






Monday, March 5, 2012

a journey that was

"Kisko dosh dein.....Safar ke talabgaar to hum hi they, fir bhi humsafar na mil sakey"

I started with a bag full of hope
with some sunshine and a longing to elope,
the day was just fine
everything seemed easy and sublime


The road was traversed and familiar
I believed I might achieve that I did never,
that breeze also played its part
nodded and promised never to depart


Breeze and me went together few miles
just to realize it wont be easy in a while,
there were roadblocks there were hurdles
and even the season brought some trouble


It all turned gloomy and grey
even the breeze decided to sway,
I was lying on the road bruised and battered
probably it ended before it started


The breeze must know
she will never be forgotten,
because she has been an eternal part
of a journey that was 





Sunday, March 4, 2012

Jyoti


एक सच्चा प्रयास था इस बार, शायद जो सुना था जो समझा था उसके मुताबिक चलने की कोशिश की थी। पूरी सच्चाई, श्रद्धा और स्पश्ता से कुछ पल चुने थे। सोचा था इन् पलों का एक गुच्छा तैयार करूंगा, जो शायद मेरे बिखरे मन के टुकड़ों को समेट सके। वो पल किसी और के थे उन्हे अपना समझना शुरू कर दिया था। मन इतना नज़दीक आगया था की लगता था ये मेरा ही जीवन है।

भावनाए हमेशा ही कमज़ोर होती हैं, हमेशा ही सहारा तलाशती रहती हैं। इसीलिए शायद भावनाओं को दोष देना उचित नहीं होगा। इस मन ने भी कुछ ऐसा ही किया, जैसे ही लगा ये पल मेरा हो सकता है झट से लपक लिया। मन को दुनिया-दारी से कहाँ मतलब होता है। बस कुछ भी देखता है और निष्कर्ष निकाल लेता है।

लेकिन सारी गलती मन की नहीं है, ये पल ही कुछ ऐसे थे। मन अपने आप ही बावरा होता चला गया। इन पलों में भी एक सच्चाई थी एक अपनापन एक नरमी थी जो ये मन हमेशा तलाशता था। आनेवाले कल की एक धुंधली सी तस्वीर भी थी जिसे शायद मन ने अपनी तस्वीर समझ लिया था। बेचारा मन इसे ये तो पता है की इसे क्या चाहिए पर वो कैसे मिलेगा इसका अंदाज़ा नहीं है इसको।

खैर जो भी हो अनेक पल समेटे इस मन ने, उस छोटे बच्चे की तरह जो हर शाम साहिल पे रेत की घरोंदे बनाता है। और अगले दिन वापस आता है इस उम्मीद में की शायद उसका घरोंदा आज भी वहीँ होगा, शायद ही कभी उसे कुछ मिलता हो वहां। कुछ ऐसा ही हो रहा था इस मन के साथ। पल तो काफी जुटा लिए थे लेकिन कभी ये पल साथ देंगे इसका विश्वास नहीं था।

मन अपनी ही करता है इसीलिए सोचता भी बोहोत है, कभी कोई विचार मिल जाए तो बस बात बन जाए। ऐसा ही करते करते एक दिन इसको एक अनुभूति भी होगई भविष्य की। शायद कुछ देख लिया था या समझ लिया था इस मन ने। तब से ये डरा डरा सा रहने लगा अपने ही विचारों पे से विश्वास खोने लगा, और फिर क्या था एक और सहारा तलाश लिया इसने। इस बार सहारा कोई और नहीं बल्कि उपरवाला ही था। मन ने सोचा उपरवाला तो सब देखता है, सही क्या है गलत क्या है ज्यादा अच्छे से समझता है वो, तो शायद कुछ मद्दद मिल जाए उससे। उपरवाला देखता तो सब है पर करता वही है जो उसकी मर्ज़ी होती है, इसीलिए शायद उससे मद्दद की उम्मीद करना भी एक गलती थी।

मुझे लगता है जिस तरह दो नाव में सवारी नहीं करनी चाहिए बिलकुल उसी तरह कभी दो सहारों पे भी भरोसा नहीं करना चाहिए। मन भगवान् के करीब तो चला गया, लेकिन जो पल वो जुटा चुका था वो धीरे धीरे उसके हाथ से रेत की तरह फिसलने लगे।

जो हो रहा था वो काफी कुछ उस विचलित करने वाली अनुभूति के अनुसार ही था। बस ये तो मन था जो हमेशा अपने आप को सांत्वना देता रहता था। सच्चाई से परे एक सपनो की दुनिया में जाने लगा था। धीरे धीरे वो पल भी ऐसे व्यवहार करने लगे जैसे कभी इस मन से मिले ही न हों। लेकिन ये मन है जो उनको कभी झूठा नहीं पायेगा। उसे आज भी लगता है वो सारे पल उसके ही हैं।

ऊपर से देखने पे एक मजबूरी सी लगती थी इन पलों की, शायद कोई रोक रहा था उन्हें। मन को लगता है जब सब कुछ टूटेगा तब भी वो दोष इन पलों को नहीं दे पायेगा। उसके अनुसार शायद दोष किसी का नहीं है, ये सब तो एक कहानी थी जो बस घटती चली गयी। मन ने वहीँ किया जो उसे करना चाहिए था, और वो पल भी वहीँ रुक गए जहाँ उन्हे रुकना चाहिए था। 

आज इस वक़्त शायद सारे पल हाथ से नहीं निकले हैं लेकिन मन जानता है उसके हाथ में शायद ही कुछ बचेगा। अभी बस इतनी ही दुआ है कि वो पल समझ लें कि दोनों का मिलना एक सच्चाई थी जिस प्रकार दोनों का अलग होना होगी। उस गुच्छे में लगा शब्दों का एक एक फूल सच्चा है और जीवन भर इस कहानी कि खुशबू संजो कर रक्खेगा। दुःख अलग होने का नहीं हैं अचरज तो इस बात पे है कि गलती किस्से और कहाँ हुई। मन के ये सबसे शांत और सुन्दर पल थे जो शायद कागज़ में ही रह जायेंगे। उन पलों का तो पता नहीं, लेकिन इस मन में ये ज्योति हमेशा जलती रहेगी।